तू समझ रहा है शायद कोई राज़दां नही है

December 24, 2007

                 तेरे हर अमल का शाहिद है यहाँ हर ऐक ज़र्रा
                 तू समझ रहा है शायद कोई राज़दां नही है
हैं जिगर के दाग़ रौशन, मुझे क्या मेरी बला से
मेरे घर के रास्ते में कोई कहकशां नही है
                जो वफायें की हैं साहिर तो सिला तलब न करना
                है ये कूचाये मोहब्बत ये कोई दुकां नही है


Leader

December 4, 2007

बेवफ़ा बावफ़ा बन गया है, राहज़न रहनुमा बन गया है।
कल डुबोया था जिस ने सफ़ीना, आज वो नाख़ुदा बन गया है।।
(साहिर हाशमी कानपुरी के कविता  संकलन “नकी़बे खुदी” से)

Contributed by Anwer Hashmi, Dubai


वारिसे हिंदोस्तां

December 4, 2007

पड़ा है वास्ता फ़ाकों से अक्सर
न रोज़ी है न रहने को मकां है
लिबासे बे लिबासी है बदन पर
येही क्या वारिसे हिंदोस्तां है ?
(साहिर हाशमी कानपुरी के कविता संकलन “नकी़बे खुदी” से)