वारिसे हिंदोस्तां

पड़ा है वास्ता फ़ाकों से अक्सर
न रोज़ी है न रहने को मकां है
लिबासे बे लिबासी है बदन पर
येही क्या वारिसे हिंदोस्तां है ?
(साहिर हाशमी कानपुरी के कविता संकलन “नकी़बे खुदी” से)

Leave a Reply