तू समझ रहा है शायद कोई राज़दां नही है

                 तेरे हर अमल का शाहिद है यहाँ हर ऐक ज़र्रा
                 तू समझ रहा है शायद कोई राज़दां नही है
हैं जिगर के दाग़ रौशन, मुझे क्या मेरी बला से
मेरे घर के रास्ते में कोई कहकशां नही है
                जो वफायें की हैं साहिर तो सिला तलब न करना
                है ये कूचाये मोहब्बत ये कोई दुकां नही है

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