Ghazlein (ग़ज़लें)

                तू समझ रहा है शायद, कोई राज़दां नही है

                 जो सुरूर दिल को बख्शे, वो सुकूं यहाँ नहीं है
                 है ये कौन शहर जिस में, कोई मेहरबां नहीं है
कोई क्या समझ सकेगा, मेरे ग़म की दास्ताँ को
कोई हमसुखन नहीं है, कोई हम ज़ुबां नहीं है
                कहीं चाक सीनए गुल, तो कहीं उदास गुंचे
                कोई फ़िक्र गुलसितां की, तुझे बागबां नहीं है
तू खिजां की आमद आमद से है किस लिए हिरासां
है ये मुज्दाये बहाराँ, ये खिजां खिजां नही है
                तेरे हर अमल का शाहिद है यहाँ हर ऐक ज़र्रा
                 तू समझ रहा है शायद कोई राज़दां नही है
हैं जिगर के दाग़ रौशन, मुझे क्या मेरी बला से
मेरे घर के रास्ते में कोई कहकशां नही है
                जो वफायें की हैं साहिर तो सिला तलब न करना
                है ये कूचाये मोहब्बत ये कोई दुकां नही है

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दूसरों पर कभी पत्थर नहीं फेका करते  

                मेरे बिगड़े हुए हालात को देखा करते
                इस नए दौर के लोग इसके सिवा क्या करते
हम तो बीमारे मोहब्बत थे भला क्या करते
जो मसीहा थे वोही ग़म का मदावा करते 
               थक के बैठे हैं कहीं दूर घनी छाओं  में
                रंजो आलाम कहाँ तक मेरा पीछा करते
शीश महलों में शबो-रोज़ जिन्हें रहना है
दूसरों पर कभी पत्थर नहीं फेका करते
                हम अगर ज़हर ऐ तास्सुब से कहीं डर जाते
                आसतीनों में कभी सांप न पाले होते
हिम्मत अफ़जाई न होती जो किसी जानिब से
लोग हम को सरे बाज़ार न रुसवा करते
               मालो ज़र के लिए नामूस भी खो बैठे हैं
                काश बोसीदा लिबासों में गुज़ारा करते
मैकदा छूटता जन्नत भी न मिलती साहिर
हम अगर शैख़ की बातों पे भरोसा करते

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2 Responses to “Ghazlein (ग़ज़लें)”

  1. hemant mehar Says:

    aaine k ru-b-ru hota nahi
    dushmano se guf-t-gu hota nahi

    yuhi behta hai na gane kyo bhala
    ashq wo kya jo luhu hota nahi

    kyo chupayu na ise mai jankar
    dag-e-dil kya aabru hota nahi

    betalluk kyo mulakate karu
    aadmi ka koi khu(swabhaw) hota nahi

    chand se hi puchh lo mera pata
    sham subho ku-b-ku(gali gali) hota nahi

  2. rafey hashmi Says:

    very good poetry

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