QatAat (चार पंक्तियों में पूर्ण कविताएँ )

इल्तिजा 

जो चाहो तुम मुझे सज़ा दो
लो शमए ज़िंदगी बुझा दो
बस इतनी इल्तिजा है मेरी
पहले मेरी खता बता दो

 लड़की

खतरे में आन होगई
सूली पे जान हो गई
मुफ़लिस है रोज़ो शब परेशां
लड़की जवान हो गई   

शिकवा 

हम से अग़्यार का शिकवा न हुआ
कैसे अपनों  की शिकायत होगी
एक दिन अपनी जफ़ाओं पे उन्हें
ख़ुद ही रह रह के निदामत होगी

 स्वागत

साकी़ है मैकदा है न हाथों में जाम है
वह दौर आगया है कि जीना हराम है
दारोरसन कहीं तो कहीं खंजरे सितम
मेरे लिए चमन में बड़ा एहतिमाम है

गुलशन 

जिसे रोज़ो शब बिजलियाँ ढूँढती हैं
जो सच पूछए तो नशेमन वोही है
संवारा गया हो जिसे खूने दिल से
हमारी निगाहों में गुलशन वोही है 

 बदनाम

मुझ को ही बदनाम किए जाते हो
दुनिया के इल्जाम दिए जाते हो
तुम भी अपनी समत कभी देखो तो
क्यों मेरा ही नाम लिए जाते हो
 

दौलत का नशा 

तहज़ीब की बुनियाद हिला देता है
अखलाक को पैगामे फ़ना देता है
बढ़ जाए अगर नश्शाये दौलत साहिर
इंसान को हैवान बना देता है

वीरान चौराहे

राही सब हैरान नज़र आते हैं
चेहरे भी बेजान नज़र आते हैं
अफवाहों का दौर, इलाही तौबा
चौराहे वीरान नज़र आते हैं

संविधान
तड़पे हैं मजबूर उठा कर लाओ
ज़ख्मों से हैं चूर उठा कर लाओ
मासूमों का कत्ल कहाँ लिखा है
भारत का दस्तूर उठा कर लाओ

ज़ख्मों पर नमक
आ पहुंचे प्रधान, सुनो मज़लूमों
लादेंगे एहसान,  सुनो मज़लूमों
ज़ख्मों पर वो आज नमक क्षिड़केंगे
होता है ऐलान, सुनो मज़लूमों

One Response to “QatAat (चार पंक्तियों में पूर्ण कविताएँ )”

  1. manu22 Says:

    Please change the theme as the Hindi text is not coming out properly. It is all broken:(

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